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देवभूमि की आह – पलायन

हरे भरे पेड़ो से आच्छादित जंगल, इसके बीचोंबीच से लहलहाती जाती हुई नदियाँ जो अमृत जल से लबालब हैं, और कुछ ही दूरी पर एक सुन्दर सा गाँव, जिसमें कोई अपने खेतों में काम करता हुआ दिख रहा है तो कुछ लोग ठन्डे ठन्डे मौसम में धूप सेंकने झुण्ड बनाकर धार में बैठे हुए है | एक साथ चिपके हुए घरों की लम्बी सी पट्टिया जिसके बड़े से आँगन मिट्ठी से लिपोए गए एसे लगते हैं मानो इनको इन घरों को बनाते समय बनाने वाले ने सारा प्रेम निछावर कर दिया हो | इन घरों में रहते हैं बड़े बड़े संयुक्त परिवार जिनमे अधिकारों की कोई लडाई नही है क्यूकि यही परंपरा उनके बुजुर्गो से चलती आई है |

शायद उपर की कुछ पंक्तियों को पढके आपके मन में ख़याल आया होगा की ये शायद किसी कवि की स्वर्ग की एक कोरी कल्पना होगी लेकिन ये सच्चाई है मेरी मातृभूमि “देवभूमि उत्तराखंड” की | आज से 15-20 वर्ष पूर्व यही नजारा लगभग हर गांव का था | लेकिन अलग उत्तराखंड बनने के18 साल बाद यही गाँव जिनमे खुशियों का स्वर्ग बसता था बेरोजगारी और लचर स्वास्थ सुविधओं के कारण पलायन की मार से खाली हो चुके हैं | इन खाली पड़े घरों की टूटी हुई दीवारें और आसपास आँगन में जमी हुई घास अगर आपकी आँखों में भावनाओं का सैलाब ना ले आये तो शायद आप उत्तराखंड को जान नही पाए हैं |

आज भी उन खाली पड़े गाँवों के बीच म खड़े होके आप कुछ देर ठहर जाईये आपको अपनी स्मृति में कैद पुरानी यादें सजग हो उठती हैं , गाँव का वह मैदान जिसकी मिटटी में खेलते हुए आपका बचपन बीता था , मंदिर के किनारे पर लगा हुआ झुला जिसमे कई गगनचुम्बी उड़ानें झूली थी , बांज के पेड़ के नीचे बनी हुई प्राइमरी पाठशाला जिसमें हाथ में एक थैली में कुछ किताबें लेकर घर से एसे दौड़ा करते थे जैसे मास्साब से ज्ञान लेके एक दिन दुनिया अपने कदमो में कर लेंगे |

और पड़ते पड़ते ना जाने कब इतने बड़े हो गये की गाँव का रास्ता ही भूल गये, मजबूरी भी थी जीवन पथ पे आगे भी बढ़ना ही था | और जब आज कई वर्सो बाद गाँव घुमने आये हैं तो लगता है जैसे ‘अरे” कल की ही तो बात थी जब सरपट इन रास्तों म छोटे छोटे क़दमों से भगा करता था और घर जाके ईजा के हाथ का चूल्हे में बना हुआ भात खाया करता था और अपनी सारी दुनिया उसी गाँव तक ही थी |

खैर अब बहुत देर हो चुकी थी | अब हर गाँव का खुशहाल संसार लगभग उजड़ सा ही गया है |इसके पीछे के कारण के लिए हर किसी के अपने अपने तर्क हैं | एसा भी नहीं था की पहले कोई समयायें नही थी, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का पर्वतीय हिस्सा होने की वजह से सरकारों का इस ओर ध्यान बिलकुल नही जा पाता था सड़कों की दूरी बहुत होने की वजह से जरूरत की छोटी मोटी वस्तुओं के लिए भी बहुत दूर की पैदल यात्रा करनी पढ़ती थी , अस्पतालों के अभाव की वजह से कई लोग असमय ही दम तोड़ दिया करते थे ,नौकरियों की भी काफी कमी थी क्योंकी सारे सरकारी पदों पर उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों के लोग ही काबिज थे |

शायद इन्ही विषमताओं के कारण अलग उत्तराखंड राज्य की मांग की गयी कि गाँव गाँव तक सडकें पहुचेंगी अस्पताल बनेंगें , रोजगार के साधन उपलब्ध होंगे | इसी सपने में युवा से लेकर बुजुर्गों तक आन्दोलन म कूद पड़े अपनी जान की बाजी लगाकर पर उन्हें क्या पता था की उनके इस संघर्ष का फायदा उठाने के लिए राजनीतिज्ञ अपनी गिद्द निगाहें लगाकर बैठे थे | आन्दोलन सफल हुआ उत्तरी हिमालय के आँचल में एक नया नवेला प्रदेश “उत्तराँचल” घोषित हुआ जो अपने सुनहरे उजले भविष्य के लिए आस्वत था |

सरकारें बदलती गयी, अधिकांश नेता विध-विधायक अपने अपने घरों को भरते गए और उत्तराखंड की जनता उनकी तरफ आस लगाये बैठी रही , जब खेती से दो वक़्त की रोटी की व्यवस्था करना भी मुस्किल होने लगा तो बेरोजगार लोग अपने अपने परिवारों को लेकर रोजगार की तलाश में सहरों की ओर जाने लगे | और जो परिवार संपन्न थे अपने बछो को उचित शिक्षा और स्वास्थ सुविधाएं देने के लिए जाने लगे | और कब छोटे छोटे खुशहाल गाँव खंडहरों म बदल गये पता ही नही चला |

सवाल बहुत हैं जो पूछे जाने हैं –कि क्या यदि गाँव गाँव तक सडकें समय पर पहुंचा दी जाती , सामुदायिक स्वास्थ केन्द्रों की स्थिति म सुधार किया जाता, उचित शिक्षा की व्यवस्था कर दी जाती और रोजगार उपलबध्ताऔर कृषि विकास की तरफ सरकारों ने ध्यान दिया होता तो की क्या पलायन रोका जा सकता था …..?

विचार कीजियेगा …….

Yogesh Sorari

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