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सोरघाटी (पिथौरागढ़) की खूबसूरती

ये शहर मुझे मेरे अंतरतम से जोड़ता है। किसी बहाने से ही सही, यहाँ अक्सर आता हूँ। यहाँ होकर अलग किरदार,अलग ही कलेवर में होता हूँ। यहाँ हर वक्त मेरे भीतर कोई संगीत बजता रहता है। जिन्दगी के छः साल किसी सुहाने मौसम की तरह गुजर गये और दे गये रूहानी महोब्बतों का तोहफा।

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जिन किस्सों का मैं हिस्सा रहा जिन चेहरों से कभी वास्ता रहा, रह रह कर याद आते हैं। कभी होठों पर मुस्कान, कभी आँखों में आँसू ले आते हैं, पर जो भी हो किसी गहरे में गोते के समान होता है यहाँ होने का एहसास।

होली, हिलजात्रा, हरेला, मोस्टामानू मेला, कपिलेश्वर, थलकेदार महाशिवरात्रि  मेला आदि तमाम आंचलिक उत्सवों और उमंग से भी सराबोर है सोरघाटी पिथौरागढ़। प्राकृतिक सौन्दर्य की समृद्धि ऐसी है कि मानो प्रकृति ने विशेष लाड़, लगाव, वात्सल्य से संवारा हो, श्रृंगार किया हो इसका।

बारह  मास खुशहाली:

‘मौसम कोई भी हो पिथौरागढ़ हमेशा गुलजार ही रहता है’।
ठण्डियों में यहाँ की आबादी दिन भर कंबल रजाई में दुबकने के बजाय चण्डाक,उल्कादेवी,थलकेदार जैसी खूबसूरत  चोटियों में एक दूसरे पर बर्फ की गोलाबारी करना पसन्द करती है। कुछ कलाकार प्रवृति के लोग बर्फ से तमाम तरह के  पुतले…शिव, पार्वति, गणेश अादि देवों की मूर्तियाँ बनाकर अपनी बाकमाल,खूबसूरत कलाकारी से मोहित करते हैं।
वहीं कुछ लोग हिमक्रीडा के लिए इन दिनों खलिया टाॅप, नन्दादेवी (मुनस्यारी) जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्रों का भी रुख़ करते हैं।

जब फागुनी छटा ओढ़ती है सोरघाटी अपने बासन्ती रूप रंग से मदहोश कर देती है। जहाँ भी नयन फेरूं निर्निमेष निहारूं,तेरे श्रृंगार के फाग गाऊं, तेरी खूबसूरती की खुमारी में सारा आलम झूम के नाचे, कोई मतवाला मदमस्त ढोल बजाए,हुड़का बजाए मैं सारे नगर को गले लगाकर होली, झोड़ा, चांछड़ा खेलूं इस कदर भावातिरेक में बहा ले जाती है सोरघाटी।

गर्मियों की दुपहरी भले ही ठुलीगाड़ व रई, पबद्यो के ताल-तलय्यों की जलक्रीडा में गुजर जाए लेकिन शाम गुजरती है तो भाटकोट के रस्ते पर,कलैक्ट्रेट की सड़कों में और खासतौर से सिमलगैर की खुशनुमा गलियों में। नैन सुख की लालसा लिए लोग इन जगहों में सूखा पड़ने ही नहीं देते हैं।
ये ही कारण है कि ये जगहें हर वक्त हरी-भरी रहती हैं। इसके अतिरिक्त नैनी-सैनी, कामाख्या देवी, महाराजा पार्क इन जगहों को भी सोर निवासी दो पल सुकून से एकांत में नहीं रहने देते हैं।

आस-पास के अन्य आकर्षण:

सोरघाटी आस-पास के अन्य क्षेत्रों से भी लोगों को आकर्षित करती है। यहाँ चम्पावत की चमक भी है, धारचूला की धमक भी है, मुनस्यारी की महक भी है, और नेपाल के नौनिहालों के लिए नमक भी है, माने की नेपाली भाईयों की रोजी-रोटी और शिक्षा का भी प्रबंध यहाँ हो जाता है।

अपनी अनूठी भौगोलिक संरचना,सामाजिक व सांस्कृतिक विशेषताओं, प्राचीन भोटान्तिक व्यापार, कैलाश मानसरोवर यात्रा का लिपूलेख दर्रा, मुनस्यारी की खूबसूरत पंचाचूली चोटियाँ, रालम, मिलम, नामिक, पोंटिंग, आदि ग्लेशियर तथा अपने विशेष पौराणिक महत्व वाली पाताल भुवनेश्वर गुफा (स्कंदपुराण), ओम पर्वत (वृहतपुराण) आदि रहस्यमयी स्थानीय विशेषताओं के कारण पिथौरागढ़, देश ही नहीं विदेशों में भी अच्छी पहचान रखता है।

कश्मीर की खूबसूरती से तुलना करके हम पिथौरागढ़ को ‘छोटा कश्मीर’ तो कह देते हैं, पर सच कहूं तो पिथौरागढ़ अतुलनीय है।

चूंकि सोरघाटी की धरा ने एक लम्बे अरसे तक मेरे प्राणों को भी अपने वात्सल्य से सिंचित किया है तो जब भी यह नाम जेहन में आता है मेरा हृदय, भाव स्पंदित होने लगता है, धड़कनों, धमनियों में उमंग प्रवाहित होने लगती है।

सोरघाटी! तुम्हें कितना भी लिखूं , काफी कुछ अनलिखा रह जाएगा। फिलहाल इतना।

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Akhilesh Sorari

उर्ष-ए-वीराँ में तरन्नुम सी कोई। बज रही सरगम मेरी धडकन में कोई।

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