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घुमक्कड़ी
घुमक्कड़ी मैख्व़ार मैं,जरा अलग हूँ… एक शराब,बूंद-बूंद मिलकर बरसती है मिरे पैमाने में…समन्दर हो जाती है..मैं उसके नशे में चूर रहता हूँ। मैं सस्ती,मस्ती नहीं…
रुकी-रुकी सी साँसें..
रुकी-रुकी सी साँसें.. रुकी-रुकी सी साँसें आ रही हैं इस कदर.. मरा-मरा सा कोई जी रहा हो जैंसे। अनवरत अश़्क यूं आँख से बह गये..…
मन-मोहक मुस्कान तुम्हारी
मन-मोहक मुस्कान तुम्हारी कौंल पद्म सी,कुंद कुसुम सी श्वेत शुभ्र शोभित सुकुमारी।   मन-मोहक मुस्कान तुम्हारी।                 मधुमय…
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