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Fwa Bagha Re – फ्वां बागा रे की कहानी

आजकल फ़्वाँ बाघ गीत बहुत चल रहा है तो आज आपको सुनाते हैं फ़्वाँ बाघ की असली कहानी !

रुद्रप्रयाग के इस कुुख्यात फ्वाँ बाघ की रामकहानी बड़ी रोमांचक है जिसे मैनईटिंग लेपर्ड आफ रुद्रप्रयाग नाम की क़िताब के रूप में लिखकर प्रख्यात पर्यावरणप्रेमी-शिकारी ज़िम काॅर्बेट ने विश्वप्रसिद्ध कर दिया है। बीबीसी ने भी 2005 में इस बाघ की कथा पर मैनहंटर्स नाम की सीरिज़ के दो एपिसोड किए थे। 8 साल तक दिन-रात गतिविधियों पर नज़र रखते हुए काॅर्बेट 2 मई 1926 को इस बाघ को मारने में सफल हो सके थे।

गुलाबराय नाम की जगह पर जहाँ ये बाघ मारा गया था, एक साइनबोर्ड अभी भी देखा जा सकता है। मारने के बाद जब इसको नापा गया तो इसकी लम्बाई 7 फीट 10 इंच थी। एक कैनाइन दाँत टूटा हआ था और पिछले पंजे का एक अँगूठा भी गायब था। ज़िम का मानना था कि प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान फैली महामारी (इंफ्लुएंज़ा बुखार) के दौरान लोग मस्त इंसानी शरीरों को बिना जलाए या दफनाए छोड़ देते थे जिन्हें खाने से ये जवानी में ही आदमखोर बन गया था।

इस बाघ के आतंक की गंभीरता इस तरह भी समझी जा सकती है कि ये ब्रिटिश हुकूमत के लिए भी सरदर्द बन गया था। बाकायदा गढ़वाल के डिप्टी कमिष्नर इब्बटसन के द्वारा अपने कारिंदों के जरिए इस बाघ की नियमित निगरानी की जाती थी और इसके शिकारों का लेखाजोखा भी रखा जाता था। इस बाघ के साथ एक रोचक तथ्य यह भी है कि भारत में वह पहला बाघ (तेंदुुुआ) था जिसे मारने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय समाचारपत्रों में विज्ञापन देकर शिकारियों को आमंत्रित किया था।

विज्ञापन के बावजूद सिर्फ तीन ही शिकारियों ने रुचि दिखायी थी। सबसे खतरनाक ज़हर साइनाइड का भी प्रयोग इस बाघ को मारने के लिए किया गया। ये फ्वाँ बाघ साइनाइड को भी पचा गया। आठ साल के आतंक के बाद जब ये मारा गया तो ये पाया गया कि साइनाइड का इस पर बस इतना ही प्रभाव पड़ा था कि इसका चेहरा और जीभ काली हो गयी थी। इसकी ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक बार इसका पंजा पिंजरे में फँस गया था।

लगभग डेढ़ कुंतल वज़न के पिंजरे को ये 500 मीटर तक खींच कर ले गया और अपना पंजा भी छुड़ा लिया। यह भी कि यह मानव-शिकार को जबड़े में पकड़ कर 500 मीटर तक बिना जमीन को छुआए ले जाने में सक्षम था। ज़िम काॅर्बेट ने खुद माना है कि ये बाघ ही वो जानवर था जिसे दुनिया में सर्वाधिक प्रचार मिला था। भारत के दैनिक व साप्ताहिक समाचार पत्रों के अलावा ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, कीनिया, मलाया, हाॅंगकाॅग, आस्ट्रेलिया व न्यूज़ीलैण्ड की प्रेस में भी इस बाघ का खूब उल्लेख हुआ करता था। इसके साथ ही तत्समय प्रतिवर्ष देश के विभिन्न हिस्सों से बदरीनाथ-केदारनाथ की यात्रा पर आने वाले 60 हजार तीर्थयात्री भी अपने साथ इस बाघ के किस्से ले जाकर प्रचारित करते थे।

फ्वाँ बाघ गीत में एक पंक्ति में हवलदार साब, सुबदार साब, लप्टन साब, कप्टन साब आता है। इस पंक्ति में व्यंग्य तो निहित है ही कि एक से बढ़कर एक रैंक वाले फौजी अफसरों की बहुलता के बावजूद एक अदद बाघ के आतंक से निजात नहीं मिल रही है। इसके साथ ही ये ऐतिहासिक तथ्य भी है कि तत्समय ब्रिटिश सरकार द्वारा गढ़वाल क्षेत्र के सभी रैंक के फौजियों को छुट्टी पर घर जाते समय राइफल साथ ले जाने की भी विशेष अनुमति दी जाती थी।

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